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यह कैसा न्यायः- जहाँ न्यायाधीश के निर्णय पर टिप्पणी ही नहीं कर सकते।
February 29, 2020 • Geeta Bisht & Dr. Naresh Kumar Choubey • social

डॉ. नरेश कुमार चौबे।

यह कैसा न्यायः- जहाँ न्यायाधीश के निर्णय पर टिप्पणी ही नहीं कर सकते। मुकदमों का फैसला करने में जज चाहे जितना भी समय ले सकते हैं, मुकदमों का अध्ययन करने में कितना भी वक्त लग सकता है, यह जज की मर्जी है कि वह अपने विवेक का कब और कैसे इस्तेमाल करे। अब अगर जज साहब ने किसी मुकदमे के फैसले में किसी कारण से कोई चूक कर दी तो बन्दा फांसी पर लटकता नजर आयेगा और इस चूक के लिए कोई हर्जाना नहीं, कोई सजा नहीं और कितनी भी देरी से फैसला सुनाया गया हो उस पर कोई छींटाकशी नहीं की जा सकती। क्योंकि न्यायाधीश महोदय पर किसी तरह की टिप्पणी करना अपराध की श्रेणी में आता है। क्या यह नहीं हो सकता कि हमारे कानून निर्माता कानून बनाने में कोई गलती कर सकते हैं या फिर जिनके कन्धों पर कानून का पालन सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी है वे अपना कर्तव्य निभाने में कोताही कर सकते हैं ? तो क्या उन पर भी कोई कानून लागू होता है जो उन्हें सजा दे सके। 
अनेकों मामलों में देखा गया है कि निचली अदालत के जज ने कोई फैसला दिया। वादी-प्रतिवादी उस फैसले के खिलाफ बड़ी अदालत में गया। वहाँ निचली अदालत के फैसले को पलट दिया गया। एक अदालत से फांसी की सजा पाया व्यक्ति दूसरी अदालत से बेदाग बरी हो जाता है। इससे क्या निष्कर्ष निकलता है कि निचली अदालत ने उन तथ्यों पर गौर नहीं किया जिन पर ऊपर की अदालत की नजर पड़ गई और फैसला पूरी तरह से पलट दिया गया। अब इस चक्कर में 2-4 से लेकर 10-20 साल तक लग जाये तो जिस निचली अदालत ने किसी व्यक्ति को अपराधी मानकर जेल में डाल दिया था उसकी तो जिन्दगी ही बदल चुकी होती है। ऊपर की अदालत ने उसे बरी कर दिया, लेकिन उसके साथ जो अन्याय हुआ, उसके लिए वह किससे न्याय मांगे। इस अवस्था में क्या उस अदालत के जज को किसी भी प्रकार की पनिसमेंट दिये जाने की कोई व्यवस्था है, जिसने अपनी अज्ञानता के कारण तथ्यों का पूरा अध्ययन किये बिना ही एक गलत फैसला दे दिया। मतलब यह है कि किसी को अपराधी करार देना या उसे अपराध से मुक्त कर देना उस एक व्यक्ति के हाथ में है जो जज की कुर्सी पर बैठा है। हमारे संविधान या कानून में ऐसा कोई प्रावधान नजर नहीं आता जिसमें उस जज को उसकी गलती की सजा दिये जाने की व्यवस्था हो। हम केवल उसे उसके विवेक के अनुसार, जो एक तरह से अपनी मर्जी है, फैसला देने की छूट देकर संतोष कर लेते हैं। क्या कोई ऐसा कानून, नियम या प्रावधान है जो उन अदालतों और वहां बैठने वालों को इस बात की सजा दे सके कि उनकी अदालतों में इतनी बड़ी संख्या में मुकदमे क्यों पैंडिंग हैं । खोजने पर भी ऐसा कुछ नहीं मिल सकेगा। जिसमें ऐसे जजों को सजा दी जा सकती हो जो तारीख पर तारीख देते रहते है।
वकील और कानून के बीच में पिसता अभियुक्त:- इसी कडी का एक जहरीला दंश से भरा हिस्सा वकील भी है। जिसके डसे हुए पानी पी-पीकर वकीलों को कोसते हैं। क्योंकि ये मुर्दे पर से कफन उतारने का काम करते हैं। एक तो व्यक्ति पुलिस और कोर्ट के चक्कर में अपना सब कुछ बेच चुका होता है और जो कुछ बचा हुआ होता है वो इस निर्लज्ज पेशे की भेंट चढ़ जाता है। हम वकीलों की बात कर रहे हैं। इन्होंने भी वो ही पढ़ाई की होती है जो विद्वान जज साहब ने। एक वकील भी मुकदमे की बारीकियां वैसे ही समझता है जैसे कि कोई जज! वकील अपनी जिरह में अधिकतर यह भ्रम फैलाने में कामयाब हो जाते हैं कि यह समझना मुश्किल हो जाता है कि व्यक्ति अपराधी है भी कि नहीं ? इसी भ्रम का फायदा उठाकर अक्सर असली अपराधी बाहर घूमते नजर आते हैं और निरअपराध जेल की सलाखों के पीछे से अपने जीवन और परिवार की बर्बादी का तमाशा देखते हैं। क्या कभी किसी सरकार ने वकीलों द्वारा लाखों में ली जाने वाली फीस को नियंत्रित करने के विषय में सोचा है? क्या वकीलों की फीस नियंत्रित करने के लिए कोई कानून बना है। अच्छे वकील लाखों में फीस मांगते हैं। यही वजह है कि अच्छा वकील करना हर मुवक्किल के बस की बात नहीं होती। वकीलों की फीस को लेकर अक्सर सवाल तो उठते हैं लेकिन आज तक किसी भी सरकार ने इसे नियंत्रित करने की आवश्यकता नहीं समझी।
‘‘ यह कैसा न्याय’’, मरीजों को जीवन देने वाले डॉक्टर उपभोक्ता संरक्षण कानून के दायरे में आते हैं। मेडिकल नैग्लीजेंसी का नाम देकर डॉक्टर के खिलाफ उपभोक्ता संरक्षण कानून के तहत कार्रवाई किये जाने का प्रावधान है। जबकि वकील यदि मुकदमे की पैरवी ठीक ढंग से नहीं करता या उसको कानून का पर्याप्त ज्ञान नहीं है तो क्या उसके खिलाफ कहीं कोई मुआवजा दिये जाने का प्रावधान है ? कतई नहीं, वकील साहब फौरन पल्ला झाड़ लेते हैं कि उन्होंने कोई कसर नहीं छोड़ी। उन्होंने तो आखिरी दम तक कोशिश की लेकिन क्या कर सकते हैं ? जबकि यही बात किसी अस्पताल या डॉक्टर द्वारा कही जाती तो उसके खिलाफ मुकदमा दायर किया जा सकता है। हमारे समाज में न्याय व्यवस्था की जो हालत आज के दौर में है वो किसी से छिपी नहीं है। लेकिन कानून बनाने वाले माननीय भी क्या करें ? सरकारों में भी लाखों की फीस लेने वाले वकील शामिल हैं, वो ऐसा कानून कैसे बनाने देंगे। न्यायालयों की हालत इतनी खराब है कि 12 जनवरी 2018 को सुप्रीम कोर्ट के चार जजों ने वाकायदा प्रेस कांफ्रंेस कर कहा कि लोकतंत्र खतरे में है। चारों माननीय कहते हैं कि उच्चतम न्यायालय में सब कुछ ठीक नहीं चल रहा। उच्चतम न्यायालय के इतिहास में पहली बार चार न्यायाधीशों ने बागी रूख अपनाते हुए आरोप लगाया कि देश की सर्वोच्च अदालत की कार्यप्रणाली में प्रशासनिक व्यवस्थाओं का पालन नहीं किया जा रहा। मुख्य न्यायाधीश द्वारा न्यायिक पीठों को सुनवाई के लिए मुकदमे मनमाने ढंग से आवंटित करने से न्यायपालिका की विश्वसनियता पर दाग लग रहा है। चारों जस्टिस क्रमशः जस्टिस कुरियन जोसेफ, जस्टिस जे.चेलमेश्वर, जस्टिस रंजन गोगोई, और जस्टिस मदन लोकुर थे। इस विषय को लेकर अनेक राजनेताओं और पूर्व जजों की टिप्पणियां भी देश के तमाम समाचार पत्रों में प्रकाशित हुई। लेकिन सरकारी नामचीन वकील उज्जवल निकम ने कहा कि यह न्यायपालिका के लिए काला दिन है। सुप्रीम कोर्ट के जजों की प्रेस कांफ्रेंस एक गलत मिशाल का कारण बनेगी। इससे कानून पर से लोगों भरोसा डिगेगा। हर कोई कोर्ट के फैसले को शंका भरी नजरों से देखेगा। इस घटना को निचली अदालतों के लिए भविष्य में नजीर नहीं बनने देना चाहिए। मैं मानता हूँ कि जजों द्वारा उठाये गये मुद्दे गंभीर किस्म के हैं लेकिन उन्हें हल करने के लिए यह तरीका सही नहीं है। वे इस मामले को राष्ट्रपति के सम्मुख ले जा सकते थे। सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व जज पी.बी.सावंत ने कहा कि इन जजों का मीडिया के सामने आने के लिए मजबूर होना एक अप्रत्याशित घटना है। इससे यह प्रतीत होता है कि कहीं कोई बड़ा मामला है। चाहे वह मुख्य न्यायाधीश से जुड़ा हुआ हो या फिर कोई आंतरिक मामला हो। कुल मिलाकर कहने का तात्पर्य यह है कि हमारी न्याय व्यवस्था पूरी तरह पंगु हो चुकी है। हम न्याय की कुर्सी पर बैठे सभी विद्वान न्यायाधीशों से स्वतंत्र, निष्पक्ष न्याय की उम्मीद नहीं कर सकते।