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शिवसेना का गैर बीजेपी दलो के साथ जाना कोई नई बात नही है।
November 15, 2019 • Geeta Bisht

सियासत के जानकारों को तो ये बात आसानी से हजम हो जाएगी, लेकिन बहुत से लोग हैं, जिन्हें ये बात हज़म नहीं हो रही है. और जिनके लिए ये पचाना मुश्किल हो रहा है कि कांग्रेस और शिवसेना साथ आ रही हैं, ये खबर उनके लिए ही है.

19 जून, 1966 को बनी शिवसेना ने अपना पहला चुनाव साल 1971 में लड़ा था. उस वक्त तक कांग्रेस दो हिस्सों में बंट गई थी. इंदिरा गांधी ने ओल्डगार्ड्स से किनारा कर लिया था और नई पार्टी बना ली थी. शिवसेना ने इंदिरा गांधी की विरोधी मोरारजी देसाई वाली कांग्रेस यानी कि कांग्रेस (O) के साथ गठबंधन किया. बाल ठाकरे ने पांच सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे. ये सीटें थीं रत्नागिरी, बॉम्बे सेंट्रल साउथ, बॉम्बे सेंट्रल, धुले और पुणे. इनमें से एक भी सीट पर शिवसेना के उम्मीदवार को जीत नहीं मिली और तीन सीटों पर तो जमानत ही जब्त हो गई. इंदिरा गांधी सत्ता में आ गईं. और फिर लगा आपातकाल. 25 जून, 1975. इमरजेंसी लागू करने का दिन. देश के इतिहास का सबसे काला दिन. और शिवसेना के मुखिया बाल ठाकरे ने इस इमरजेंसी का खुलेआम समर्थन कर दिया. 31 अगस्त, 1975 को उन्होंने मार्मिक अखबार में आर्टिकल लिखकर कहा कि इंदिरा गांधी ने इमरजेंसी इसलिए लगाई, क्योंकि देश में फैली अस्थिरता से निबटने के लिए इकलौता उपाय यही था.


1977 में जब लोकसभा के चुनाव हुए तो बाल ठाकरे ने कांग्रेस का समर्थन कर दिया और अपने उम्मीदवार नहीं उतारे. इतना ही नहीं, बाल ठाकरे ने मैदान में उतरकर इंदिरा गांधी के पक्ष में चुनाव प्रचार भी किया. बाद के दिनों में शिवसेना को इसका खामियाजा भी भुगतना पड़ा. 1978 के महाराष्ट्र के विधानसभा चुनाव में बाल ठाकरे ने महाराष्ट्र में 35 सीटों पर उम्मीदवार उतारे, लेकिन शिवसेना का एक भी उम्मीदवार जीत दर्ज नहीं कर पाया. इस हार से शिवसेना मुखिया बाल ठाकरे इतने परेशान हुए कि उन्होंने शिवसेना चीफ के अपने पद से इस्तीफे की पेशकश कर दी. हालांकि बाद में उन्होंने अपना इस्तीफा वापस ले लिया और कहा कि वो शिवसैनिकों के दबाव में ऐसा कर रहे हैं.


साल 1979 में बीएमसी के चुनाव थे. शिवसेना ने इंडियन मुस्लिम लीग के नेता गुलाम मोहम्मद बनतवाला के साथ समझौता किया. दोनों लोगों ने एक साथ एक रैली को संबोधित भी किया, लेकिन उनका गठजोड़ आगे के चुनावों में कायम नहीं रह पाया. शिवसेना एक बार फिर से कांग्रेस के पाले में खड़ी दिखी. 1980 में बाल ठाकरे ने महाराष्ट्र के कांग्रेस के नेता रहे एआर अंतुले से अपनी दोस्ती की वजह से चुनाव में कांग्रेस का समर्थन कर दिया और एक बार फिर से शिवसेना चुनाव से दूर रही.


इसके बाद 12 अप्रैल, 1982 को बाल ठाकरे ने मार्मिक में एक और लेख लिखा और इस लेख के जरिए इंदिरा गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस का समर्थन कर दिया. बाल ठाकरे ने मुंबई के मिलों में हुई हड़ताल को तोड़ने के लिए कांग्रेस के समर्थन का ऐलान किया था. और ये आखिरी बार था, जब शिवसेना ने कांग्रेस का समर्थन किया था. जब कांग्रेस नेता बाबा साहेब भोसले ने एआर अंतुले की जगह ले ली, तो बाल ठाकरे ने कांग्रेस से किनारा कर लिया. साल 1984 में इंदिरा गांधी की मौत के बाद जब लोकसभा के चुनाव हुए, तो शिवसेना के नेता मनोहर जोशी के साथ ही एक और शिवसेना नेता ने बीजेपी के टिकट पर चुनाव लड़ा. हालांकि मनोहर जोशी हार गए, लेकिन बीजेपी-शिवसेना गठबंधन की नींव का पहला पत्थर रखा जा चुका था.


बाकी दो-तीन और बातें हैं. पहली तो ये है कि एनसीपी नेता शरद पवार की बेटी का नाम है सुप्रिया सुले. उनके पति का नाम है सदानंद भालचंद्र सुले. सदानंद भाल चंद्र सुले बाल ठाकरे की बहन सुधा सुले के बेटे हैं. और दूसरी बात ये है कि साल 2006 में जब शरद पवार ने राज्यसभा के जरिए अपनी बेटी सुप्रिया सुले की सियासी शुरुआत की, बाल ठाकरे ने राज्यसभा के लिए अपना प्रत्याशी नहीं उतारा. बाल ठाकरे ने कहा था-

”वो मेरी बेटी की तरह है. जब मैंने सुना कि वो राजनीति में आने जा रही है, मैंने पवार को बुलाया और कहा कि सुप्रिया के खिलाफ कोई कैंडिडेट नहीं खड़ा होगा.”


इसके अलावा बाल ठाकरे ने बीजेपी से गठबंधन के बाद एक और मौके पर कांग्रेस का साथ दिया. हालांकि ये समर्थन पार्टी का कम और व्यक्तिगत ज्यादा था. ये बात तब की है, जब कांग्रेस सांसद सुनील दत्त के बेटे संजय दत्त टाडा में फंसे थे. और उस वक्त बाल ठाकरे ने बीजेपी की पार्टी लाइन से अलग जाकर संजय दत्त का बचाव किया था.


अब एक बार फिर से शिवसेना के सामने 1984 से पहले की स्थिति है. शिवसेना फिर से कांग्रेस और एनसीपी का समर्थन करने जा रही है, लेकिन इसपर आखिरी मुहर लगनी अब भी बाकी है