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प्रज्ञा ठाकुर को लेकर मोदी की नाराजगी केवल दिखावा है
December 5, 2019 • Geeta Bisht • political

नरे । कुमार चौबे। प्रज्ञा ठाकुर जब तक बीजेपी में रहेंगी पार्टी के लिए सिरदर्द साबित होती रहेंगी ये बात पार्टी के शीर्ष नेताओं को भी मालूम है। अब देखना है कि इस बार पार्टी क्या फैसला लेती है। रही बात प्रज्ञा ठाकुर की तो उन्हें इन सब बातों से कोई फर्क नहीं पड़ता। आखिर बीजेपी की क्या मजबूरी है, जो उसे प्रज्ञा ठाकुर पर कड़ी कार्रवाई करने से रोक रही है ? आपको याद होगा जब लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरान साध्वी प्रज्ञा ने गोडसे को देशभक्त बताया था तब उसे लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने न सिर्फ अपनी नाराजगी जाहिर की थी, बल्कि यहां तक कहा था कि 'भले ही उन्होंने माफी मांग ली हो लेकिन मैं दिल से कभी उन्हें माफ नहीं कर पाऊंगा। "प्रधानमंत्री की नाराजगी के बाद ऐसा लगा था कि प्रज्ञा ठाकुर आगे से इस तरह का बयान नहीं देंगी। लेकिन हुआ ठीक उल्टा, अब तो उन्होंने संसद में ही गोडसे को देशभक्त करार दे दिया। जब संसद में दिए उनके बयान पर विपक्ष ने सरकार को घेरना शुरू किया तो बीजेपी को बैकफुट पर आना ही पड़ा। पार्टी के कार्यकारी अध्यक्ष जेपी नड्डा ने सफाई दी कि बीजेपी कभी ऐसे बयानों का समर्थन नहीं कर सकती है। प्रज्ञा ठाकुर के बयान पर मचे हंगामे के बाद रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने लोकसभा में कहा कि हम गोडसे पर ऐसी सोच रखने वालों की निंदा करते हैं। मामला बिगड़ता देख बीजेपी को आनन-फानन में प्रज्ञा ठाकुर को रक्षा मंत्रालय की कमिटी से बाहर का रास्ता दिखाना पड़ा और तो और पार्टी ने प्रज्ञा पर संसदीय दल की बैठक में भी आने पर रोक लगा दी। लेकिन क्या इतना सब काफी है ? क्या पार्टी की सख्ती से प्रज्ञा ठाकुर पर कोई असर होगा ? सवाल है कि अगर बीजेपी को लगता है कि प्रज्ञा ठाकुर ने गलती की है तो फिर उन्हें पार्टी में रखने की क्या मजबूरी है ? प्रज्ञा ठाकुर के बयानों पर हर बार किनारा कर लेने से ही बीजेपी अपनी जिम्मेदारियों से नहीं बच सकती। बीजेपी को अब फैसला लेना ही होगा क्योंकि अगर इतना सब कुछ होने के बाद भी प्रज्ञा ठाकुर को पार्टी से नहीं निकालती है तो फिर इसका लोगों में गलत संदेश जाएगा। मुझे लगता है कि हाल के वर्षों में अगर बीजेपी से कोई बड़ी भूल हुई है तो वो है प्रज्ञा ठाकुर को पार्टी में शामिल कर भोपाल से सांसद बनाना। भोपाल से पार्टी उम्मीदवार घोषित होने के बाद से प्रज्ञा ठाकुर ने कई ऐसे विवादित बयान दिए जिससे बीजेपी की छवि को गहरा धक्का लगा। ये वही प्रज्ञा ठाकुर हैं जिन्होंने चुनाव प्रचार के दौरान शहीद हेमंत करकरे को लेकर विवादित टिप्पणी की थी। वैसे बाद में उन्होंने अपने बयान पर माफी मांग ली थीलेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। आपको बता दें कि चुनाव प्रचार के दौरान जब प्रज्ञा ठाकुर ने गोडसे को देशभक्त करार दिया था तब बड़ा सियासी बवाल मचा था। पार्टी ने उनके बयान को निजी बताकर उन्हें आगे से होशियार रहने की सलाह दी थी, खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उनके बयान से दुखी थे। लेकिन प्रज्ञा ठाकुर पर इसका कोई असर नहीं हुआ। जब बीजेपी ने भोपाल से दिग्विजय सिंह के खिलाफ प्रज्ञा ठाकुर को उम्मीदवार बनाया था तब भी कई लोगों ने इस फैसले को गलत बताया था। लेकिन बीजेपी को चुनाव जीतना था, सो उसे उस वक्त प्रज्ञा से बेहतर कोई उम्मीदवार नजर नहीं आया। चलिए हम एक बार मान लेते हैं कि बीजेपी से गलती हो गई। लेकिन सवाल उठता है कि आखिर उन्हें रक्षा मामलों की परामर्श समिति में क्यों शामिल किया गया ? जाहिर है अब बीजेपी कितनी भी सफाई पेश करे कोई फायदा नहीं होने वाला। क्योंकि अब उसके लिए एक्शन लेने का समय आ गया है। अगर बीजेपी ने समय रहते प्रज्ञा पर कार्रवाई नहीं की तो फिर उसके लिए मुसीबत खड़ी हो जाएगी। प्रज्ञा ठाकुर जब तक बीजेपी में रहेंगी पार्टी के लिए सिरदर्द साबित होती रहेंगी ये बात पार्टी के शीर्ष नेताओं को भी मालूम है। अब देखना है कि इस बार पार्टी क्या फैसला लेती है। रही बात प्रज्ञा ठाकुर की तो उन्हें इन सब बातों से कोई फर्क नहीं पड़ता। गौरतलब है कि प्रज्ञा ठाकुर पर हिन्दू आतंकवाद का जो ठप्पा लगा था और उन्हें अपनी जिंदगी के खूबसूरत पल जेल में बिताने पड़े थे, जो कि किसी काले अध्याय से कम नहीं थेप्रज्ञा ठाकुर के बयानों में वो दर्द हमेशा झलकता है। शायद उन्हें लगता है कि भाजपा ने उन्हें चुनकर सही प्लेटफार्म उपलब्ध कराया है। यही वजह है कि उनके बयान तीखे और कटाक्ष भरे होते है। हो सकता है देश के सेक्यूलर लोगों को उनके बयानों से आपत्ति हो, लेकिन कहीं ना कहीं भाजपा को उनके तीखे बयानों से फायदा ही हो रहा है। शायद यही वजह है कि भाजपा प्रज्ञा ठाकुर फायर ब्राण्ड को ढोने के लिए मजबूर हैजो लोग प्रज्ञा ठाकुर के बयानों पर आपत्ति जताते हैं वो ये कैसे भूल जाते हैं कि देश के पूर्व रक्षा मंत्री और गृहमंत्री यहां तक कि देश के प्रधानमंत्री पद के दावेदार राहुल गांधी के बयानों पर उन्हें आपत्ति क्यों नहीं है।