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निशुल्क कानूनी सहायता : हमारे मूलभूत अधिकार
December 6, 2019 • Geeta Bisht & Dr. Naresh Kumar Choubey • political

डॉ. नरेश कुमार चौबे। निशुल्क कानूनी सहायता :- हमारी सरकारों ने निशुल्क कानूनी सहायता को एक 'मूल अधिकार' के रूप में माना सहायता के पीछे मूल सिद्धान्त यह है कि न्याय प्रणाली में धन के प्रभाव की कोई भूमिका नहीं होनी चाहिए। शायद निशुल्क सरकार द्वारा उपलब्ध कराये जाने के पीछे भी यही मंशा रही होगी। निशुल्क कानूनी सहायता तंत्र का गठन भी संविधान के अंतर्गत किया गया था। जिसमें न्याय के लिए सबको समान अवसर का सिद्धान्त घोषित किया गया है। हमारे देश में यह के लिए बनाई गई है। जिसमें ग्रामीण, गरीब, अनपढ़, वरिष्ठ नागरिक और महिलाएं, अपंग लोग, नशे के चक्रव्यूह में फंसे ऐसे लोग जिनके लिए कानूनी सहायता का प्रबंध करने वाला बाहर कोई न हो। ऐसे लोग निःशुल्क कानूनी सलाह के हकदार व्यक्ति जाने-अनजाने में किसी अपराधिक मामले में फंस जाता है उसके अलावा उसके परिवार में ऐसा कोई व्यक्ति नहीं कर सके। या फिर धन के अभाव में प्राईवेट वकील की फीस का बोझ वो उठा नहीं पाता है। या यों कहें कि गरीबी के खिलाफ आवाज न उठा पाये तो वास्तव में यह एक अमानवीय अवस्था होगी जो किसी भी समाज या देश के लिए चुनौती समाज या देश विश्व में एक सभ्य देश कहलाने का हकदार नहीं हो सकता। न्याय के समान अधिकारों को लागू करने सर्वोच्च न्यायालय से लेकर निचली अदालतों तक में निःशुल्क कानूनी सहायता के लिए समीतियां गठित की गई हैं । निःशुल्क का प्रबंध करने के पीछे बहुत महान उद्ददेश्य रहे होंगे। लेकिन वास्तव में हमारी निःशुल्क कानूनी सहायता क्या अपना कार्य कर रही है ? आज भी गरीब, लाचार व्यक्ति को निचली अदालतों में तारीख, धक्के और सजा ही मिलती है। अदालतें सरकारी देती हैं लेकिन सरकारी वकील बाध्य नहीं होता कि वो पेशी पर आयेगा कि नहीं? कानूनी सहायता के नाम पर सर रहा है। निःशुल्क कानूनी सहायता केन्द्रों से मिलने वाले वकीलों का जो रवैया गरीब लोगों के प्रति है वो किसी से छिपा लिखना इसलिए आवश्यक है कि हमें पता चल सके कि निःशुल्क कानूनी सहायता के नाम से भी कितना बड़ा धोखा देश जा रहा है। दिल्ली की सेंट्रल जेल में दिल्ली सरकार द्वारा गरीब, असहाय या ऐसे लोगों के लिए जिनकी पैरवी करने निःशुल्क कानूनी सहायता उपलब्ध कराई जाती है। लेकिन इसका लाभ कितने लोगों को मिलता है क्या सरकार के आंकड़े मौजूद हैंआंकड़े अगर हों भी तो प्रत्यक्ष में इसका लाभ मैंने किसी गरीब, असहाय को मिलते नहीं देखा, अपवाद हो लीगल सर्विस के नाम पर वकीलों का गोरख धन्धा चल रहा है। सलाह देने के नाम पर गरीब, असहाय लोगों का उपहास सलाह देने के नाम पर गरीब, तो खरीद लो अन्यथा सड़ते रहो

भाषा समझना सामान्य व्यक्ति पक्ष अपने-अपने विश्वास के ही अपने पक्ष में उसका लाभ उठाने दक्ष वकील की सेवाएं लेने आंकड़े मौजूद हैंआंकड़े अगर हों भी तो प्रत्यक्ष में इसका लाभ मैंने किसी गरीब, असहाय को मिलते नहीं देखा, अपवाद हो सकता है। जेलों में लीगल सर्विस के नाम पर वकीलों का गोरख धन्धा चल रहा है। सलाह देने के नाम पर गरीब, असहाय लोगों का उपहास उड़ाया जाता है। मेरे देश में न्याय मिलता नहीं खरीदा जाता है, जिसकी औकात है तो खरीद लो अन्यथा सड़ते रहो जेलों मे!

उसकी भाषा समझना सामान्य व्यक्ति के लिए सम्भव नहीं होता। इसलिए जब भी कोई कानूनी वाद-विवाद अदालत के समक्ष प्रस्तुत होता है तो दोनों पक्ष अपने-अपने विश्वास के वकील के माध्यम से अपना पक्ष प्रस्तुत करते हैं। किसी भी नियम कानून की व्याख्या करते हुए एक दक्ष व्यक्ति ही अपने पक्ष में उसका लाभ उठाने का प्रयास कर सकता है। इसलिए अदालतों में विवाद आते ही प्रत्येक पक्षकार अपने लिए अधिक से अधिक दक्ष वकील की सेवाएं लेने का प्रयास करता है। दसरी ओर जिस वकील की प्रसिद्धी अधिक दक्ष व्यक्ति के रूप में हो जाती है, वह स्वभाविक रूप से अपनी सेवा के बदले फीस भी अधिक मांगने लगता है। ऐसे वकील की सेवाएं लेना सामान्य वर्ग के बस की बात नहीं होती। अदालतों के प्रति सामान्य जन के मन में एक धारणा और बलवती होती जा रही है। अक्सर कहा जाता है कि फलां वकील साहब की जज साहब से सेटिंग है, वो जमानत करा ही देंगे। नाम बदनाम जज साहब का, काम वकील साहब का। मेरे संज्ञान में अनेकों ऐसे मामले आये हैं। जहां वकीलों ने मर्डर जैसे मामलों में जेल में बन्द बंदियों की जमानत के लिए लाखों रूपये जज साहब से सेटिंग के नाम पर ले लिए और जमानत न होने पर बेशर्मी की हदें पार करते हए पैसे वापस भी नहीं दिये । केस लडना तो दूर की बात है, कोर्ट में आना ही बन्द कर देते हैं, धमकी अलग से देते हैं। परेशान व्यक्ति झक मारकर दूसरा कोई वकील तलाशता है। ऐसे केसों में आपके लिए कहीं कोई ऐसा दरवाजा नहीं बना, जिससे ऐसे लुटेरे वकीलों की शिकायत कर सको। न्यायिक प्रक्रिया के चंगुल में फंसा चरण से और दुखी हो जाता है। ऐसे में निचली अदालतों का भी यह दायित्व बनता है कि वो सर्वसामान्य व्यक्ति को न्याय दिलाने के लिए योग्य, एवं विश्वासी वकील उपलब्ध कराये। यह देखने में भी आता है कि सर्वोच्च न्यायालय कई ऐसे निर्णय भी जारी कर चुका है, जिनमें यदि निचली अदालतों में किसी गरीब या अनपढ़ व्यक्ति को निःशुल्क कानूनी सहायता उपलब्ध न करवाई गई हो तो उसके विरूद्ध किये गये निर्णयों को अवैध घोषित कर दिया जाता है। सर्वोच्च न्यायालय को निःशुल्क कानूनी सहायता तंत्र पर निगरानी का दायरा बढ़ाना चाहिए। देश के प्रत्येक जिले और उससे नीचे की एक-एक अदालत से यह विवरण मंगवाना चाहिए कि उसके पास निःशुल्क कानूनी सहायता की कैसी व्यवस्था उपलब्ध है, और उसका कितना उपयोग किया जाता है ? सर्वोच्च न्यायालय देश की सभी छोटी-बड़ी अदालतों को यह निर्देश भी जारी कर सकता है कि यदि किसी मुकदमे में गरीब, अनपढ़ या अन्य असहाय लोग बिना वकील की सहायता के दिखाई दे तो उन्हें सरकार की तरफ से वकील की सुविधाएं उपलब्ध करवाना प्रत्येक न्यायाधीश का प्रमुख दायित्व होना चाहिए। इस कार्य में लापरवाही करने वाले न्यायाधीशों के विरूद्ध भी कार्रवाई का प्रावधान लागू किया जा सकता है सकता है। सर्वोच्च न्यायालय की इस निगरानी प्रक्रिया के प्रारम्भ होते ही निःशुल्क कानूनी सहायता के वास्तविक प्रयासों में तेजी आ सकती है।