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किसके तरकस में कितने तीर कौन सा तीर करेगा घाव गंभीर
January 2, 2020 • Geeta Bisht & Dr. Naresh Kumar Choubey

डॉ. नरेश कुमार चौबे, नई दिल्लीदिल्ली देश की राजधानी भारत का दिल भी कहा जाता है। संभावित केन्द्र शासित प्रदेश के चुनाव फरवरी 2020 में होने हैं। जो दिल्ली कभी कांग्रेस पार्टी की जागीर हुआ करती थी, आज दिल्ली “आप” आम आदमी पार्टी की जागीर बनी हुई है। दरअसल दिल्ली की कहानी भी कुछ अलग है। दिल्ली में दिल्ली वाले कम देश के अन्य राज्यों के कमतर बेरोजगारों, बिगडैलों की भरमार ज्यादा है। जिसका फायदा केजरीवाल ने जमकर उठाया है। दिल्ली जो कि कभी लुटियन जोन के कारण जानी जाती थी, आजकल जे.जे.स्लम के कारण जानी जाती है। यही जे.जे.स्लम कांग्रेस का वोट बैंक हुआ करता था, आज यही जे. जे.स्लम “आप” का वोट बैंक बन गया है। कभी दिल्ली में हरियाणा और पंजाब का वर्चस्व हुआ करता था लेकिन अन्य राज्यों में बढ़ती बेरोजगारी के कारण हो रहे पलायन के कारण बहुतायात में बिहार और पूर्वांचल के निवासियों की एक बहुत बड़ी आबादी दिल्ली और उसके आस-पास आ बसी है। जो आज निर्णायक वोटर बन बैठी है। यही 'आम आदमी पार्टी' का वोटर है। कांग्रेस जहां दिल्ली में ताज पोशी के लिए तरह-तरह के हथकण्डे अपना रही है, पूर्वांचल और बिहार के वोटरों को रिझाने के लिए कीर्ति आजाद के हाथ कमान देने की सोची, लेकिन बिरोध हुआ और कमान सुभाष चोपड़ा के हाथ में दे दी गई। शीला दीक्षित की कमी कांग्रेस पार्टी को खल रही है। शीला दीक्षित ने लगातार दिल्ली पर पन्द्रह वर्ष शासन किया। दिल्ली के विकास में शीला दीक्षित का अतुलनीय योगदान रहा है। दिल्ली की जनता आज भी शीला दीक्षित को दिल्ली के विकास के लिये याद करती है। बाबा रामदेव और अन्ना आन्दोलन से उपजे केजरीवाल ने दिल्ली की जनता की नब्ज को खूब समझा और अपने लिए कैश किया। पहले 49 और फिर 67 विधान सभा सीटों पर केजरीवाल ने कब्जा किया, और ऐसे-ऐसे व्यक्ति विधान सभा पहुंचे जो कि कल्पना से भी परे था । आन्दोलन की झनक थी, दिल्ली की जनता बदलाव चाहती थी सो दिल्ली की सत्ता केजरीवाल के हाथ में सौंप दी ।

केजरीवाल दिल्ली की जनता की नब्ज खूब पहचानते थे। यही वजह है कि मुफ्त पानी, बिजली हाफ, महिलाओं को बस यात्रा मुफ्त जैसी योजनाएं बनाकर, अन्धाधुन्ध विज्ञापन कर दिल्ली की जनता को भरमाने का प्रयास किया है। दिल्ली की जनता भी शायद मुफ्तखोरी की अदी है तभी तो केजरीवाल की मुफ्तखोरी की योजनाओं का सम्मान वोट देकर करते हैं। कांग्रेस 'आम आदमी पार्टी को विभिन्न मुद्दों पर घेरने की कोशिश करती नजर आती है, लेकिन दमदारी नहीं दिखाई देती। देश में एन.आर.सी, सी.ए.ए जैसे मुद्दों का विरोध हो रहा है जिस विरोध का कांग्रेस पार्टी समर्थन करती है। “आप” भी इस मुद्दे पर कांग्रेस के साथ खड़ी है। अतः ये कहा जा सकता है कि दोनों पार्टियां भाजपा का ही विरोध करते नजर आयेंगें दिल्ली में दरअसल कोई मुद्दा है ही नहीं, भाजपा पीने के पानी को लेकर 'आप' का विरोध करती नजर आती है। लेकिन भाजपा के 'आप' के विरोध के स्वर बिखरते नजर आते हैं । केन्द्र में भाजपा सरकार होने के बावजूद भी भाजपा दमदार तरीके से 'आप' का विरोध नहीं कर पा रही। दरअसल दिल्ली भाजपा खेमों में बंटी हुई है। मनोज तिवारी को भाजपादिल्ली विधानसभा का चुनाव स्थानीय मुद्दों पर लड़ा जाता है। लेकिन ना ही भाजपा और ना ही कांग्रेस कोई ऐसा मुद्दा ला पा रही है, जो केजरीवाल की नींव में सेंध लगा सके। हांलाकि इस बार के चुनाव में केजरीवाल अपना रिपोर्ट कार्ड पेश कर अपने हार के डर को निकालने का पुरजोर प्रयास कर रहे हैं कल तक आम आदमी की बात करने वाला केजरीवाल आज आम आदमी की बात नहीं करता। अब उसे अन्ना का जनलोकपाल और भ्रष्टाचार भी याद नहीं आता। सत्ता की चमक ने केजरीवाल को बदल दिया है ऐसा कहना है उन्हीं के साथ आन्दोलन करने वाले साथियों की, जिन्हें अब दर किनार कर दिया गया है। कांग्रेस के प्रदेशाध्यक्ष सुभाष चोपड़ा दिल्ली में कितना कुछ कर पायेंगे, इसमें सन्देह है। ऐसा लगता है कि भाजपा और कांग्रेस के तरकस में केजरीवाल के खिलाफ चलने वाले तीरों का अभाव है। जबकि किसके तरकस में कितने तीर, जो घाव करे गंभीर, वाली कहावत दिल्ली के चुनाव में चरित्रार्थ होने जा रही है। आने वाले समय में दिल्ली का मौसम गरम होने वाला है। कांग्रेस और भाजपा को अगर दिल्ली की सत्ता में आना है तो अन्दरूनी कलह छोड़कर ठोस मुद्दों पर काम करना होगा। अपने तीरों को और अधिक पैना करना होगा। के दिल्ली के भाजपाई हजम नहीं कर पाते हैं। वैश्य लॉबी विजय गोयल और विजेन्द्र गुप्ता की ओर देखती है। हालांकि मनोज तिवारी को दिल्ली भाजपा की जिम्मेदारी देकर भाजपा नेतृत्व ने केजरीवाल को दमदार टक्कर दी थी। लेकिन दिल्ली भाजपा की आपसी कलह के कारण ही दिल्ली का तख्त भाजपा से दूर ही है। दूसरा एक बड़ा कारण कांग्रेस का दमदारी से चुनाव न लड़ना भी भाजपा की हार का कारण बन सकता है। दिल्ली विधानसभा का चुनाव स्थानीय मुद्दों पर लड़ा जाता है। लेकिन ना ही भाजपा और ना ही कांग्रेस कोई ऐसा मुद्दा ला पा रही है, जो केजरीवाल की नींव में सेंध लगा सके। हांलाकि इस बार के चुनाव में केजरीवाल अपना रिपोर्ट कार्ड पेश कर अपने हार के डर को निकालने का पुरजोर प्रयास कर रहे हैं कल तक आम आदमी की बात करने वाला केजरीवाल आज आम आदमी की बात नहीं करता। अब उसे अन्ना का जनलोकपाल और भ्रष्टाचार भी याद नहीं आता। सत्ता की चमक ने केजरीवाल को बदल दिया है ऐसा कहना है उन्हीं के साथ आन्दोलन करने वाले साथियों की, जिन्हें अब दर किनार कर दिया गया है।

कांग्रेस के प्रदेशाध्यक्ष सुभाष चोपड़ा दिल्ली में कितना कुछ कर पायेंगे, इसमें सन्देह है। ऐसा लगता है कि भाजपा और कांग्रेस के तरकस में केजरीवाल के खिलाफ चलने वाले तीरों का अभाव है। जबकि किसके तरकस में कितने तीर, जो घाव करे गंभीर, वाली कहावत दिल्ली के चुनाव में चरित्रार्थ होने जा रही है। आने वाले समय में दिल्ली का मौसम गरम होने वाला है। कांग्रेस और भाजपा को अगर दिल्ली की सत्ता में आना है तो अन्दरूनी कलह छोड़कर ठोस मुद्दों पर काम करना होगा। अपने तीरों को और अधिक पैना करना होगा।