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हिमालय की गोद में बसा है शंकर का धाम केदारनाथ
January 28, 2020 • Geeta Bisht & Dr. Naresh Kumar Choubey • religious

केदारनाथ एक पवित्र स्थान होने के साथ-साथ एक बेहद खूबसूरत जगह भी है। सर्दियों के मौसम में यहां खूब बर्फबारी होती है। श्रद्धालु भगवान के दर्शन के साथ यहां की खूबसूरत वादियों और बर्फबारी का भी मजा उठाते हैं। कहते हैं केदारनाथ धाम के मात्र दर्शन से भक्तों को समस्त पापों से मुक्ति मिल जाती है। यही वजह है कि हर साल यहां लाखों भक्त केदारनाथ के दर्शन के लिए आते हैं। लेकिन जून 2013 में आयी केदारनाथ में भयंकर त्रासदी ने कोहराम मचा दिया।

केदारनाथ में जो कुदरत ने विनाशलीला रची थी उसे देखकर ऐसा लगा मानों शिव स्वम अपने तांडव रूप में आ गये हो । केदारनाथ में आई प्राकृतिक आपदा के बाद तुरंत किसी को भी समझ नहीं आया कि आखिर इतना बड़ा संकट किस वजह से आ गया। कयास तो बहुत लगाए गए, लेकिन पुख्ता वजह किसी को पता नहीं थी। साल भर बाद ही केदारनाथ धाम के द्वार फिर भक्तों के लिए खुल गये और एक बार फिर यह साबित हो गया कि भक्त की भक्ति के आते कोई भी संकट आ जाए लेकिन शिव की भक्ति करना भक्त नहीं छोड़ सकते। केदारनाथ धाम एक बार फिर शिव के हिमालय की तरह खड़ा हो गया, करोड़ो श्रद्धालु दर्शन के लिए शिव की नगरी जाने लगे। केदारनाथ एक पवित्र स्थान होने के साथ-साथ एक बेहद खूबसूरत जगह भी है।

सर्दियों के मौसम में यहां खूब बर्फबारी होती है। श्रद्धालु भगवान के दर्शन के साथ यहां की खूबसूरत वादियों और बर्फबारी का भी मजा उठाते हैं। भारत के उत्तराखंड राज्य में स्थित, हिमालय की गोद में बसा यह एकांत सा कस्बा प्राचीन युग का एक दिलचस्प पवित्र स्थान है। इसके आसपास बर्फ से ढंकी ऐसी पहाड़ियां हैं जो अचरज में डाल देती हैं। उत्तराखण्ड में हिमालय पर्वत की गोद में केदारनाथ मन्दिर बारह ज्योतिर्लिंग में सम्मिलित होने के साथ चार धाम और पंच केदार में से भी एक है। शिव के इस मंदिर को पत्थरों से कत्यूरी शैली में बनाया गया है।

यहां के पुजारियों की मानें तो इस विशाल मंदिर का निर्माण पाण्डव वंश के जनमेजय ने कराया था। यहाँ स्थित स्वयम्भू शिवलिंग अति प्राचीन है। सदियों बाद इस मंदिर का जीर्णोद्धार आदि शंकराचार्य ने करवाया था। सावन के महीने में यहां श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ जाती है। माना जाता है कि सावन के महीने में शिव के दर्शन और उनकी आराधना करने से मन से मांगी हर मुराद पूरी हो जाती हैयह मंदिर 3,583 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है लेकिन तब भी भक्त शिव की भक्ति में लीन होकर मंदिर तक पहुंच ही जाते हैं।