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डिस्ट्रिक्ट रिजर्व ग्रुप जिससे खौफ खाते हैं नक्सली भी
December 8, 2019 • Geeta Bisht & Dr. Naresh Kumar Choubey

डॉ. नरेश कुमार चौबे, रायगढ़। छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित इलाकों में डिस्ट्रिक्ट रिजर्व ग्रुप लड़ाकों का एक ऐसा समूह है जिससे नक्सली खौफ खाते हैं। बहुत कम वेतन में काम करने वाले इन लड़ाकों के कारण बस्तर में पुलिस माओवादियों के खिलाफ लगातार सफलता प्राप्त कर रही है। राज्य के सर्वाधिक नक्सल प्रभावित सुकमा जिले में नक्सलियों ने बसत नाग (परिवर्तित नाम) के परिजनों की हत्या कर उसका घर जला दिया था।

नक्सलियों ने नाग के परिवार द्वारा नक्सल विरोधी अभियान सलवा जुडूम में शामिल होकर उनका विरोध करने के कारण ऐसा किया। नाग की ही तरह कई और ऐसे आदिवासी युवक हैं कि जिनके परिवार के सदस्यों को नक्सलियों ने बेरहमी से मार डाला तथा उनकी संपत्ति को नुकसान पहुंचाया है। यह लड़के अब पुलिस के साथ कंधे से कंधा मिलाकर नक्सलियों के खिलाफ लड़ रहे हैं। अपनी जमीन के लिए लड़ रहे इन लड़ाकों के कारण पुलिस को लगातार सफलता मिल रही है। नाग और उसके जैसे कई युवक आज डीआरजी के सबसे अच्छे सिपाहियों में से एक हैं जिनसे नक्सली खौफ खाते हैं।

छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र में वर्ष 2005-06 में वरिष्ठ आदिवासी नेता और विधानसभा में तत्कालीन नेता प्रतिपक्ष महेंद्र कर्मा के नेतृत्व में सलवा जुडूम आंदोलन शुरू किया गया था। इस आंदोलन में आदिवासी ग्रामीण नक्सलियों के खिलाफ एकजुट हुए और उनके कारी के रूप में लड़ने वाले सलवा जुडूम कार्यकर्ताओं के कारण पुलिस को कई मौकों पर सफलता मिली । लेकिन बाद में यह आंदोलन बंद हो गया। सलवा जुडूम से नाराज नक्सलियों ने जुडूम कार्यकर्ताओं और नेताओं को चुन-चुन कर निशाना बनाया और एक हमले में महेंद्र कर्मा की भी हत्या कर दी गई। इधर राज्य में युवाओं को विकास की धारा से जोड़ने के लिए पुलिस विभाग में सहायक आरक्षक के पद पर बस्तर के स्थानीय युवाओं को नौकरी दी गई। इस पहल में सलवा जुडूम से जुड़े कार्यकर्ताओं और कभी नक्सलियों के साथी रहे आत्मसमर्पित युवकों ने बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया। इन्ही युवकों में से कुछ युवकों को बस्तर क्षेत्र के जिलों में डीआरजी में शामिल किया गया है। आज स्थिति यह है कि जिन अभिय । सफलता मिली है उन सभी में डीआरजी की टीम शामिल रही है। वर्ष 2015 में डीआरजी की टीम 644 नक्सल विरोधी अभियानों में शामिल हुई और इस दौरान 46 नक्सलियों को मारा गया। इस वर्ष 144 अभियान में 25 माओवादियों को मारा गया है।

डीआरजी ने इन अभियानों को अकले अपने दम पर या जिला पुलिस और सशस्त्र बलों के साथ मिलकर पूरा किया है। पुलिस विभाग से मिली जानकारी के मुताबिक बस्तर क्षेत्र के विभिन्न जिलों में अलग-अलग समय पर डीआरजी का गठन किया गया। वर्ष 2008 में कांकेर जिले और अबूझमाड़ के ज्यादातर हिस्से वाले नारायणपुर जिले में डीआरजी का गठन किया गया। जब इस दल ने अपना काम बेहतर तरीके से करना शुरू किया तब वर्ष 2013 में बीजापुर और बस्तर जिले में तथा वर्ष 2014 में सुकमा और कोंडागांव जिले में इसका गठन किया गया। दंतेवाड़ा जिले में इसका गठन वर्ष 2015 में किया गया। बस्तर क्षेत्र में अभी डीआरजी के 1,700 जवान काम रहे हैं। सबसे ज्यादा 482 जवानों की तैनाती सुकमा जिले में है तथा बीजापुर जिले में 312 जवानों की तैनाती की गई है। डीआरजी जवानों का वेतन और सुविधाएं पुलिस के एक सिपाही के मुकाबले कम है। लेकिन यह बेहतर परिणाम दे रहे हैं । डीआरजी के जवान को कुल मिलाकर 15 हजार रूपए वेतन मिलता है जिसमें भत्ते भी शामिल हैं अब इनका भी बीमा किया जा रहा है। बस्तर क्षेत्र के पुलिस महानिरीक्षक एसआरपी कल्लूरी का कहना है कि पिछले एक साल में डीआरजी के जवानों ने कई महत्वपूर्ण अभियानों को अंजाम दिया जिसके चलते नक्सली अब पीछे हट गए हैं।

कल्लूरी कहते हैं कि डीआरजी के जवान यहां के स्थानीय लड़के हैं, अपनी मिट्टी से प्रेम करते हैं और क्षेत्र में शांति चाहते हैं इसीलिए वे नक्सलियों के खिलाफ लड़ रहे हैं। डीआरजी यहां की संस्कृति, भाषा और क्षेत्र से पूरी तरह परिचित हैं जिसके चलते वह नक्सलियों के खिलाफ लड़ाई में कामयाबी हासिल करते हैं। पुलिस अधिकारी बताते हैं कि लगभग सभी अभियानों में डीआरजी की टीम को रखा जाता है, चाहे वह अर्ध सैनिक बलों का हो या पुलिस का हो । इससे अभियान की सफलता की संभावना बढ़ जाती है। आत्मसमर्पित नक्सलियों के इस टीम में शामिल होने के कारण वह यहां के नक्सलियों और उनके नेताओं को पहचानते हैं तथा उनकी चालों को भी बेहतर तरीके से समझते हैं। डीआरजी जवानों के स्थानीय होने के कारण वह नक्सलियों के रूकने के स्थानों और उनको मिलने वाली सहायता के बारे में भी जानते हैं तथा स्थानीय लोर्गा से संपर्क होने के कारण वह बेहतर तरीके से अभियान की रणनीति तैयार कर लेते हैं। कल्लूरी ने बताया कि डीआरजी के जवानों को दसरे राज्यों के सेना शिविरों में कडा प्रशिक्षण दिया गया है तथा कछ इकाइयों को आंध्र प्रदेश के ग्रेहाउंड यनिट से छापामार युद्ध का भी प्रशिक्षण भी मिला है।