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भीमा कोरेगांव केस: किसने रची PM Modi की हत्या की साजिश?
February 17, 2020 • Geeta Bisht & Dr. Naresh Kumar Choubey • political

हिंदुस्तान से अंग्रेज़ तो सत्तर साल पहले विदा हो गए। लेकिन फूट डालो और राज करो का बीज़ जो उन्होंने बोया था, वह आज पूरे भारत में फैलकर विशाल वटवृक्ष बन गया है। जिसकी वजह से हमारा समाज आज भी जाति, धर्म, भाषा, नस्लवाद और दलित, अगड़े, पिछड़े, हिंदुत्व और इस्लाम में विभाजित है। रही सही कसर राजनीति और नेताओं की विषैली सोच ने पूरी कर दी है। महाराष्ट्र में पुणे के नज़दीक भीमा कोरेगांव में दलितों पर हुई कथित हिंसा और हमले की बात उसी बोए हुए बीज का अंकुरण है। एक तरफ हम तरक्की और विकास की बात कर रहे हैं। भारत को सवा सौ अरब वाला देश कह रहे हैं और दूसरी तरफ उसी देश में अपनों के खिलाफ जीत का जश्न मनाया जा रहा है। फिर आखिर हम किस भारत के विकास और उसमें निहित सामाजिक समरसता की बात करते हैं? आज हम आपको इतिहास की गलियों से गुजरते हुए वर्तमान के एनआईए के पास मामला पहुंचने की भीमा-कोरेगांव की पूरी कहानी बताएंगे। साथ ही आपको बताएंगे कि क्या 200 साल पहले अंग्रेजों और पेशवाओं के बीच हुई इस लड़ाई ने महाराष्ट्र को जातीय हिंसा की आग में ढकेल दिया। या फिर इस पूरे मामले को एक सोची समझी साजिश के तहत अंजाम दिया गया।

31 दिसंबर 2017 को एक कार्यक्रम का आयोजन किया गया था। इस कार्यक्रम में 200 वर्ष पहले हुए कोरेगांव युद्ध को याद किया गया। जेएनयू में भारत विरोधी नारे लगाने का आरोपी उमर खालिद इस कार्यक्रम में मौजूद था। तब उस वक्त उमर खालिद के साथ गुजरात के निर्दलीय विधायक जिग्नेश मेवाणी भी मौजूद थे। जिसके बाद इन दोनों के खिलाफ पुलिस थाने में शिकायत की गई कि दोनों ने भड़काऊ भाषण दिए। जिग्नेश मेवाणी के भाषण से दो समुदायों के बीच तनाव फैला और उन्होंने लोगों से सड़कों पर उतरने के लिए कहा और इसकी वजह से ही ये तनाव फैला। 
 
 
जिग्नेश मेवाणी जितनी भड़काऊ बातें करते हैं उतनी ही ज्यादा तालियां बजती हैं। जो क्रांति होगी वो संसद या विधानसभा में नहीं बल्कि सड़कों पर होगी कहने वाले नेता का विरोधाभास देखिए। क्रांति सड़कों पर होने का दावा करने वाले ये नेता खुद विधायक बनने की लालसा रखते हुए चुनाव में उतरते हैं। ये नेता ऐसे होते हैं जो लोगों को कहते हैं कि आप सड़कों पर उतरिए एक दूसरे को मरने-मारने पर उतारू करते हैं और उकसाते हैं और खुद बड़े आराम से या तो विधायक बनना चाहते हैं या सांसद बनना चाहते हैं।
 
 
1 जनवरी 2018 को महाराष्ट्र के भीमा कोरेगांव में पेशवा बाजीराव पर ब्रिटिश सैनिकों की जीत जश्न मनाया जा रहा था, तब हिंसा भड़क उठी जिसमें एक शख़्स की जान गई और उस दौरान कई वाहन भी फूंके गए थे। पहली जनवरी को भीमा नदी के किनारे स्थित मेमोरियल के पास दिन के 12 बजे जब लोग अपने नायकों को श्रद्धांजलि देने इकट्ठा होने लगे तभी हिंसा भड़की। पत्थरबाज़ी हुई और भीड़ ने खुले में खड़ी गाड़ियों को आग के हवाले कर दिया। पुणे के शनिवारवाडा में एल्गार परिषद कॉन्क्लेव में कथित तौर पर आपत्तिजनक भाषण दिए गए थे। पुलिस का दावा है कि इन भाषणों के बाद ही कोरेगांव भीमा वॉर मेमोरियल के पास अगले दिन दंग भड़क उठे थे। पुलिस ने माना कि इसके लिए एल्गार परिषद में मानवाधिकार कार्यकर्याओं के भाषण जिम्मेदार थे। बाद में गिरफ्तार लोगों को अर्बन नक्सल बताकर उन पर प्रधानमंत्री मोदी की हत्या की साजिश का आरोप भी लगा दिया गया। 
हैदराबाद- वरवरा राव, 
दिल्ली- गौतम नवलखा
फरीदाबाद- सुधा भारद्वाज
रांची- स्टीन स्वामी
ठाणे- अरूण फरेरा
मुंबई- वरनॉन गोंजाल्विस
 
 
देशभर में विभिन्न जगहों पर पुणे पुलिस ने ताबड़तोड़ छापेमारी करते हुए महाराष्ट्र के भीमा कोरेगांव में हुई हिंसा से जुड़ा हुआ बताते हुए इन लोगों को गिरफ्तार किया। बता दें कि कवि वरवरा राव के घर छापेमारी इसलिए की गई क्योंकि एक आरोपी रोना विल्सन के घर से मिली एक चिट्ठी में उनका नाम था। उस चिट्ठी में राजीव गांधी की हत्या जैसी प्लानिंग का जिक्र करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को निशाना बनाने की बात लिखी थी। इसके बाद पुलिस ने तेजी लाते हुए पांच लोगों को गिरफ्तार किया। उनसे पूछताछ पर करीब 250 ईमेलों की छानबीन शुरू हुई। उससे मिले सुराग के आधार पर वरवरा राव, सुधा भारद्वाज, गौतम नवलखा आदि को हिरासत में लिया। 
इस पूरे मामले के तार जून में मिले एक पत्र से जुड़े हैं जिससे पीएम मोदी की हत्या की साजिश का खुलासा हुआ था। पत्र में किन बातों का जिक्र है वो भी बता देते हैं। 
प्रधानमंत्री मोदी की हत्या की साजिश की योजना
( जून में दिल्ली के मुनरिका से मिला था पत्र)
मोदी 15 राज्यों में भाजपा को स्थापित करने में सफल हुए हैं। यदि ऐसा ही रहा तो सभी मोर्चों पर पार्टी के लिए दिक्कत खड़ी हो जाएगी। कामरेड किशन और कुछ अन्य सीनियर कामरेड ने मोदी राज को खत्म करने के लिए कुछ मजबूत कदम सुझाए हैं। हम सभी राजीव गांधी जैसे हत्याकांड पर विचार कर रहे हैं। ये आत्मघाती जैसा मालूम होता है और इसकी भी अधिक संभावनाएं हैं कि हम असफल हो जाएं। लेकिन हमें लगता है कि पार्टी हमारे प्रस्ताव पर विचार करे, उन्हें रोड शो में टारगेट करना एक असरदार रणनीति हो सकती है। 
 
 
कोरेगांव भीमा
कोरेगांव भीमा में एक स्तंभ है जिसे विजय स्तंभ कहा जाता है। इतिहास की मानें तो 202 साल पहले  यानी 1 जनवरी 1818 में ब्रिटेन की ईस्ट इंडिया कंपनी और मराठा साम्राज्य के पेशवा गुट के बीच, कोरेगांव भीमा में जंग लड़ी गई थी। इस लड़ाई में अंग्रेजों और आठ सौ महारों ने पेशवा बाजीराव द्वितीय के 28 हज़ार सैनिकों को पराजित कर दिया था। महार सैनिक यानी दलित, ईस्ट इंडिया कंपनी की ओर से लड़े थे और कहा जाता है कि इसी युद्ध के बाद पेशवा राज का अंत हो गया। महार जिन्हें महाराष्ट्र में दलित कहा जाता है। उस दौर में देश ऊंच-नीच और छुआछूत जैसी कुरीतियों से घिरा हुआ था। अगड़ी जातियां दलितों को अछूत मानती थीं। महाराष्ट्र में मराठा अगड़ी जाति से हैं। वहीं महार समुदाय दलित वर्ग से है। अंग्रेजों ने इसका फायदा उठाया और हिंदुओं को बांटने के लिए ईस्ट इंडिया कम्पनी ने दलितों में महार के नाम पर एक अलग से रेजीमेंट बनाई। इसमें दलितों ने अंग्रेजों का साथ दिया और मराठों को पराजित कर दिया। यहां शौर्य दिवस हर साल मनाया जाता है और करीब 15 से 20 हजार दलित यहां इकट्ठा होते हैं। लेकिन साल 2018 में यहां करीब साढ़े तीन लाख दलित इकट्ठा हुए। वजह थी कोरेगांव भीमा की लड़ाई को 200 साल पूरे हुए थे। लेकिन 1 जनवरी को सवर्णों के साथ हुई झड़प में ये गांव दहल उठा और बाद में पूरा महाराष्ट्र। 
 
 
अब आते हैं वर्तमान पर एलगार परिषद मामले की सुनवाई कर रही पुणे की कोर्ट ने यह मुकदमा मुंबई की विशेष एनआईए अदालत को ट्रांसफर कर दिया। वहीं इस केस के एनआईए को ट्रांसफर को लेकर एनसीपी चीफ शरद पवार ने महाराष्ट्र सरकार पर सवाल खड़े किए हैं। इस मामले की जांच एनआईए को दिए जाने पर पवार ने उद्धव ठाकरे सरकार की आलोचना की है। शरद पवार का कहना है कि कानून व्यवस्था का मामला राज्य का है और राज्य सरकार को केंद्र के ऐसे निर्णय का समर्थन नहीं करना चाहिए। 
बहरहाल, महाराष्ट्र में मामले को लेकर शिवसेना और एनसीपी में रार शुरू हो गई है। लेकिन सवाल ये उठता है कि आजाद भारत में गुलामी के प्रतीक इस तरह के शौर्य दिवस मनाने की ज़रूरत आखिर क्या है? 200 साल पहले का भारत अब पूरी तरह बदल चुका है। फिर उस घाव को शौर्य दिवस के रूप में हरा करने की बात समझ से परा है। वह दौर था जब दलितों के साथ अत्याचार होते रहे थे, ऊंची जातियां उनसे भेदभाव करती थीं, लेकिन आज वक्त बदल गया है और अंग्रेजी हुकूमत का दौर भी नहीं रहा।-