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अमित शाह ने अपनी पार्टी को जिताने के लिए जो कड़ी मेहनत की है वह बेमिसाल थी
February 7, 2020 • Geeta Bisht & Dr. Naresh Kumar Choubey • political

दिल्ली विधानसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी को काँटे की टक्कर देने की स्थिति में लाने में यदि सबसे बड़ा योगदान किसी का है तो वह है गृहमंत्री अमित शाह का। दिल्ली में 1993 से लेकर अब 2020 तक के विधानसभा चुनावों में भाजपा ने बेशक कड़ी मेहनत की हो लेकिन 2020 में अमित शाह ने जिस तरह धुआंधार चुनाव प्रचार का नेतृत्व किया वह अभूतपूर्व है। दिल्ली में पार्टी के सामान्य कार्यकर्ता के घर जाकर सादा भोजन करना हो, हर दिन आधा दर्जन से ज्यादा जनसभाएँ करना हो, रोड शो करना हो या फिर घर-घर जाकर पर्चे बाँटना हो...अमित शाह कभी पीछे नहीं रहे। इससे पहले दिल्ली की कच्ची कालोनियों की गलियों ने पहले कभी नहीं देखा कि देश का गृहमंत्री छोटी-छोटी सभाएँ करने या घर-घर संपर्क करने उनकी गलियों में आ रहा हो। भाजपा के किसी प्रत्याशी ने भी कभी नहीं सोचा होगा कि देर रात को खुद देश के गृहमंत्री और पार्टी के वरिष्ठ नेता उनके चुनाव कार्यालय आकर चुनावी तैयारियों की समीक्षा करेंगे।
 
 
अमित शाह सिर्फ चुनावी रणनीति बनाने में ही माहिर नहीं हैं बल्कि वह सांगठनिक कौशल भी खूब रखते हैं। गत वर्ष जब पार्टी का सदस्यता अभियान जोरशोर से चलाया जा रहा था तो अमित शाह ने खासतौर पर दिल्ली में इस बात पर नजर रखी कि इस कार्य में कोई फर्जीवाड़ा नहीं हो। बतौर भाजपा राष्ट्रीय अध्यक्ष उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि सक्रिय सदस्य बनने के इच्छुक लोग जिन लोगों को पार्टी की प्राथमिक सदस्यता दिला रहे हैं वह उस कार्य की फोटो भी उन्हें भेजें। जिन लोगों को पार्टी का सदस्य बनाया गया उन्हें वेरिफाई भी कराया गया। इस तरह दिल्ली में पार्टी की बुनियाद मजबूत करने के बाद अमित शाह ने दिल्ली में भाजपा की चुनावी रणनीति पर काम करना शुरू किया और कई गुटों में बंटी दिल्ली भाजपा को एकजुट रखने के लिए बिना मुख्यमंत्री उम्मीदवार को सामने किये सिर्फ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चेहरे पर चुनाव लड़ने का फैसला किया और उसी का परिणाम रहा कि दिल्ली भाजपा के सभी बड़े नेता पार्टी को जिताने के लिए मेहनत करते नजर आये।
 
 
अमित शाह यह बात भलीभांति जानते हैं कि चुनावों के समय रियल टाइम फीडबैक कितना जरूरी होता है। इसीलिए उन्होंने दिल्ली के हर विधानसभा क्षेत्र में पार्टी सांसदों, विधायकों खासकर गुजरात के सांसदों को पार्टी के लिए कठिन समझी जा रही सीटों पर तैनात किया ताकि हर बूथ पर पार्टी की रणनीति के मुताबिक मतदान करवाया जा सके। बूथ प्रभारियों, विधानसभा क्षेत्र प्रभारियों, विधानसभा क्षेत्र में पार्टी के विस्तारकों और संगठन मंत्रियों के साथ अमित शाह पूरे चुनाव के दौरान सीधे संपर्क में रहे। यही नहीं हर विधानसभा सीट पर वहां के जातिगत समीकरणों को देखते हुए उस जाति से संबंधित पार्टी के अन्य राज्यों के नेताओं को भी कार्य में लगाया गया ताकि वह जातिगत समीकरणों को साध सकें। यही नहीं जब उम्मीदवारों के चयन का काम चल रहा था तो आवेदन करने वाले सभी नामों पर ध्यान दिया गया और जिन लोगों को टिकट नहीं मिलना था उनको मनाने के लिए पहले से ही पार्टी संगठन के लोग तैनात कर दिये गये जिससे कि वह बागी होकर पर्चा दाखिल नहीं कर पाये।
 
 
विधानसभा चुनावों के दौरान प्रचार में अमित शाह किस कदर व्यस्त रहे इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि देर रात तक जनसभाएँ और रोड शो करने के बाद वह 10 बजे से लेकर रात 12 बजे तक पार्टी प्रत्याशियों के चुनाव कार्यालयों पर बैठकें लेते रहे और उसके बाद रात्रि दो बजे तक दिल्ली भाजपा कार्यालय में अहम बैठकें कर दिन भर के चुनाव प्रचार की समीक्षा और अगले दिन की रणनीति बनाते रहे। भाजपा का चुनाव प्रचार चाहे वह सोशल मीडिया पर हो, अखबारों या टीवी चैनलों पर हो या फिर बैनरों-पोस्टरों पर, सबकुछ अमित शाह की निगरानी में चलता रहा। अमित शाह किस तरह बारीक से बारीक चीज पर नजर रखते हैं यह इसी बात से साबित हो जाता है कि वह दिल्ली भाजपा के तमाम व्हाट्सएप ग्रुपों में भी हैं ताकि उन्हें यह पता चलता रहे कि उनके साइबर योद्धा सामने वाले की ओर से किये जाने वाले वारों का जवाब किस तरह दे रहे हैं।
 
 
दिल्ली विधानसभा चुनावों के परिणाम चाहे जो भी हों, लेकिन अमित शाह ने अपनी पार्टी को जिताने के लिए जो कड़ी मेहनत की है वह बेमिसाल थी। उन्होंने भाजपा के पूरे काडर को जिस तरह चुनावों में सक्रिय कर दिया वैसा करना किसी अन्य नेता के लिए आसान कार्य नहीं होगा। चुनावी मुद्दे क्या होंगे, चुनावी हवा का रुख कैसे बदला जाता है यह सब तय करने में सचमुच अमित शाह का कोई विकल्प नहीं है। अब देखना यह है कि इतने प्रयासों के बाद भाजपा देश की राजधानी दिल्ली में 20 साल का अपना वनवास समाप्त कर पाती है या नहीं।