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अजब संयोग, 28 साल बाद इतिहास दोहराया, तीनों सेनाओं के प्रमुख NDA के एक ही बैच से हैं
January 2, 2020 • Geeta Bisht & Dr. Naresh Kumar Choubey

डॉ. नरेश कुमार चौबे नए साल के ठीक एक दिन पहले 31 दिसम्बर को देश के 28वें थलसेना अध्यक्ष के रूप में कार्यभार संभालने वाले 59 वर्षीय वरिष्ठ सैन्य अधिकारी मुकुंद नरवणे के सामने गंभीर सामरिक चुनौतियां हैं। उन्होंने ऐसे विकट समय में यह दायित्व संभाला है, जब भारत हर पल सीमा पर चीन और सीमापार पाकिस्तान से मिल रही सुरक्षा चुनौतियों से जूझ रहा है। देश के पहले चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ नियुक्त जनरल (रिटायर्ड) बिपिन रावत के बाद वे सेना में सबसे वरिष्ठ अधिकारी हैं। जनरल मुकुंद नरवणे भारतीय सेना में अप्रैल 2022 तक तक अपनी सेवाएं देंगे। वे 1 सितम्बर 2019 से वाइस चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ (उप सेना प्रमुख) की जिम्मेदारी निभा रहे थे। इससे पहले वह कोलकाता स्थित उस ईस्टर्न आर्मी कमांड (पूर्वी कमान) का नेतृत्व कर चुके हैंए जो पूर्वी कमान की चीन से लगने वाली करीब चार हजार किलोमीटर लंबी सीमा की निगरानी करती है।

महाराष्ट्र के पुणे में एक मराठी परिवार में 22 अप्रैल 1960 को जन्मे नरवणे की छवि सख्त और ईमानदार सैन्य अधिकारी की है। वे सेना में अपने 39 साल लंबे कार्यकाल में विभिन्न कमानों में शांति, क्षेत्र, आतंकवाद तथा उग्रवाद रोधी बेहद सक्रिय माहौल में जम्मू कश्मीर तथा पूर्वोत्तर में अपनी सेवाएं दे चुके हैं। उन्होंने राष्ट्रीय राइफल्स बटालियन को कमांड करने के अलावा कई महत्वपूर्ण स्ट्राइक को लीड किया है। डिफेंस कॉरीडोर में उन्हें चीन के साथ रक्षा संबंधी मामलों का विशेषज्ञ माना जाता है। वह जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद के खिलाफ अभियान का नेतृत्व भी कर चुके हैं। उन्होंने तीन वर्षों तक म्यांमार स्थित भारतीय दूतावास में डिफेंस अटैचे के तौर पर कार्य किया और 1987 में श्रीलंका में चलाए गए ऑपरेशन पवन में भारतीय शांति रक्षक बल का हिस्सा भी रहे । नरवणे को उत्कृष्ट कार्यों के लिए कई मैडलों से नवाजा जा चुका है। भारतीय सेना के गौरवशाली इतिहास में अठाइस वर्ष बाद दूसरी बार ऐसा हो रहा है, जब राष्ट्रीय रक्षा अकादमी के बैचमेट एक साथ तीनों सेनाओं के प्रमुख हैं। वर्ष 1991 में तत्कालीन थलसेना प्रमुख सुनीत फ्रांसिस रोडरिग्ज, नौसेना प्रमुख एडमिरल लक्ष्मी नारायण रामदास तथा एयर चीफ मार्शल निर्मल चंद्र सूरी ने तीनों सेनाओं का नेतृत्व किया था। उन तीनों ने एनडीए का कोर्स एक साथ ही किया था। अब लेफ्टिनेंट जनरल नरवणे के थल सेनाध्यक्ष बनने के बाद एक बार फिर यही इतिहास दोहराया गया है। फिलहाल देश की तीनों सेनाओं के अध्यक्ष एनडीए के पूर्व छात्र ही हैं और तीनों ने एनडीए में एक साथ कोर्स किया है। थल सेनाध्यक्ष मुकुंद नरवणे, एयर चीफ मार्शल आरकेएस भदौरिया तथा नौसेना अध्यक्ष करमबीर सिंह ने 1976 में एनडीए का 56वां कोर्स एक साथ किया था। लेफ्टिनेंट जनरल मनोज मुकुंद नरवणे ने सैन्य प्रमुख का पदभार संभालते ही जिस प्रकार पाकिस्तान को दो टूक लहजे में कड़ा संदेश देते हुए कहा है कि अगर पड़ोसी देश प्रायोजित आतंकवाद को नहीं रोकता है तो भारत के पास आतंक के स्रोत पर हमला करने का अधिकार है, उससे उनकी प्राथमिकताओं का स्पष्ट अहसास स्वतः ही हो जाता है। पाक प्रायोजित आतंकवाद के मुद्दे से निपटने के बारे में उन्होंने साफतौर पर कहा है कि पाकिस्तान के उकसावे या उसके द्वारा प्रायोजित आतंकवाद के किसी भी कृत्य का जवाब देने के लिए उनके पास बहुत सारे विकल्प हैं। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि अगर पाकिस्तान ने प्रायोजित आतंकवाद बंद नहीं किया तो हम पहले ही खतरे की जड़ पर वार करेंगे और यह हमारा अधिकार है। उनका कहना था कि इस बारे में हमने अपने इरादे सर्जिकल स्ट्राइक और बालाकोट ऑपरेशन के दौरान जाहिर कर ही दिए थे। बहरहाल पाकिस्तान और चीन जैसे कुटिल देशों की पेश की जाती रही सुरक्षा चुनौतियों के मद्देनजर जनरल नरवणे के समक्ष उनके इस नए कार्यकाल में बहुत सारी चुनौतियां रहेंगी। हालांकि सीडीएस जनरल बिपिन रावत ने उम्मीद जताते हुए कहा है कि भारतीय सेना देश के समक्ष सुरक्षा चुनौतियों का सामना करने के लिए बेहतर ढंग से तैयार है और लेफ्टिनेंट जनरल नरवणे के नेतृत्व में सेना नई ऊंचाईयां छुएगी।

 नई जिम्मेदारी से जुड़ी चुनौतियों के बारे में सेना प्रमुख नरवणे का कहना है कि फोकस किए जाने वाले क्षेत्रों पर तत्काल कुछ भी कहना जल्दबाजी होगी, समय के साथ इस पर आगे बढ़ा जाएगा। हालांकि यह तय है कि घाटी में सीमा पार से जारी आतंकवाद पर लगाम लगाना, उत्तरी सीमाओं पर सेना की संचालनात्मक क्षमताओं को बढ़ाना तथा सेना में लंबे समय से अटके सुधारों को लागू करना उनकी प्राथमिकताओं में शुमार रहेगा। नरवणे सेना के आधुनिकीकरण को स्वदेशी बनाने के पक्षधर रहे हैं। उनका मानना है कि चूंकि हमारे पास सुव्यस्थित ऑर्डिनेंस फैक्टरियां और उच्च तकनीक हैए इसलिए हमें आत्मनिर्भर बनना चाहिए। उनका मानना है कि भारत के पास निजी क्षेत्र की बड़ी क्षमताएं हैंए जिनका सहारा लेकर हम न केवल आत्मनिर्भर बन सकते हैं बल्कि हथियार निर्यात भी कर सकते हैं। सेना में इस समय बड़े स्तर पर आधुनिकीकरण के कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं और ऐसे में लेफ्टिनेंट जनरल मनोज मुकुंद नरवणे के कंधों पर सरकारी फंडिंग और आधुनिकीकरण की प्रक्रिया को सेना के हर हिस्से तक पहुंचाने की अहम जिम्मेदारी होगी।